Saturday, 28 February 2009
आपका कम्प्यूटर डेस्कटॉप है, आपके जीवन का आईना!
सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन यह सच है. इंसान की पहचान उसके कम्प्यूटर डेस्कटॉप से भी हो सकती है.
विंडोज़ विस्टा द्वारा कराए गए एक सर्वे से भी पता चला है कि डेस्कटॉप का अध्ययन कर व्यक्ति के स्वभाव और उसके जीवन मूल्यों के बारे मे जाना जा सकता है.
एक अमेरिकी समाचार पत्र की खबर के अनुसार, मानव मनोविज्ञान को समझने का आसान तरीका व्यक्ति के कम्प्यूटर डेस्कटॉप की जाँच हो सकता है.
मनोविज्ञानी डोना डाउसन के अनुसार, लोग अपना डेस्कटॉप सजाते समय इस ओर गौर नहीं करते लेकिन उनका डेस्कटॉप उनके स्वभाव और उनकी प्राथमिकताओं के बारे मे काफी जानकारियाँ दे देता है. डेस्क्टॉप देखकर जाना जा सकता है कि व्यक्ति कलाकार है, अंतर्मुखी है, भावुक है, बेपरवाह है या स्वप्नशील है आदि.

कुछ उदाहरण देखिए:
- यदि डेस्कटॉप पर कोई आइकन ही ना हों तो इसका मतलब कि वह व्यक्ति अपनी निजी जिंदगी को गुप्त रखता है और अंतरमुखी है.
- यदि डेस्कटॉप पर बेतरतीब आइकन हों तो इसका मतलब कि वह व्यक्ति बेपरवाह स्वभाव का है.
- यदि किसी व्यक्ति के डेस्कटॉप पर उसके परिवार के सदस्यों की फोटो हो तो इसका मतलब कि वह व्यक्ति अपने परिवार को “हद से अधिक” चाहता है. और उसकी प्राथमिकता परिवार के आसपास घूमती है.
- यदि डेस्कटॉप पर उत्साहवर्धक वाक्य लिखे हों तो इसका मतलब कि व्यक्ति दूसरों से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाता है, और थोडा असुरक्षित महसूस करता है.
- यदि आइकन दोनों तरफ बराबर रखे हुए हों तो इसका मतलब कि वह व्यक्ति अपने जीवन मे संतुलन बनाकर चलता है.
- यदि आइकनो को कई समूहों मे रखा गया हो तो इसका मतलब कि उस व्यक्ति को सबकुछ हाथों हाथ चाहिए होता है.
यह लेख पढने के तुरंत बाद शायद आप अपना डेस्कटॉप जाँचना चाहेंगे!
Source tarakash.com
Monday, 23 February 2009
धारावी से आस्कर के रेड कारपेट तक..

लास एंजिलिस। 'स्लमडाग मिलियनेयर' में झुग्गी बस्ती के बच्चों का किरदार निभाना अजहरुद्दीन इस्माइल और रुबीना अली के लिए शायद इतना मुश्किल न रहा हो। मगर मुंबई के धारावी में रहने वाले इन बच्चों ने अपना सबसे शानदार प्रदर्शन आस्कर समारोह के रेड कारपेट पर किया। अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी दुनिया की मीडिया के सामने इन बच्चों को देखकर यह अहसास नहीं हुआ कि वे पहली बार ऐसा माहौल देख रहे हैं। स्लमडाग के नन्हें स्टार दरअसल एक ऐसा इतिहास रच गए हैं जिसका हिस्सा बनने का अरमान भविष्य में दुनिया के अन्य बच्चे भी जरूर पालेंगे। इन बच्चों अजहरुद्दीन इस्माइल, रुबीना अली, तनय चहेडा और आयुष खेडेकर ने आस्कर के उस मंच पर कदम रखने का गौरव हासिल किया जहां पहुंचने के इंतजार में लोगों की सारी जिंदगी गुजर जाती है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर उनकी तरफ भी थी और उनके साथ सितारों जैसा व्यवहार किया जा रहा था। फिल्म की नायिका लतिका का बचपन का किरदार अदा करने वाली नौ वर्षीय रुबीना अपने सहयोगी कलाकार अजहरुद्दीन के साथ अब भी झुग्गी में रहती है। उसने कभी सोचा नहीं था कि वह एक दिन हवाई जहाज में सफर करेगी। रूबीना ने आस्कर समारोह में हल्की नीली पोशाक पहनी थी और उसके हाथों पर मेंहदी की लाली भी नजर आ रही थी जबकि लड़कों ने सूट पहन रखा था।
रुबीना और अजहरुद्दीन के माता-पिता ने ऐन वक्त पर अपने च्च्चों को आस्कर समारोह में भेजने की इजाजत दी थी। गुरुवार को उनका वीजा और पासपोर्ट मिला और शुक्रवार को वे मुम्बई में खरीददारी के लिए गए थे। फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले 18 वर्षीय अभिनेता देव पटेल ने कहा, 'ये बच्च्े बडे़ स्टार हैं। ये प्रोत्साहन के हकदार हैं।' स्लमडाग के निर्देशक डैनी बोयल ने इन बच्चें को आस्कर समारोह में शामिल होने की इजाजत देने का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा, 'यही सब कुछ है। यही सही क्लाइमैक्स है। इन बच्चें की यहां मौजूदगी ने माहौल को मुकम्मल किया है।'
फिल्म में काम करने वाली तनवी गणेश लोंकर ने कहा,'बहुत अच्छा लग रहा है। हमने इसका सपना भी नहीं देखा था।' समारोह के दौरान बातचीत में इन बच्चों ने उम्मीद जाहिर की कि भविष्य में उन्हें और फिल्मों में काम करने का मौका मिलेगा।
धारावी में भी मना जश्न
मुंबई। यहां जिंदगी तमाम दुश्वारियों के बावजूद खुशगवारी का दामन नहीं छोड़ती। मुंबई में बसी दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक धारावी में सोमवार को जश्न की एक नई वजह भी थी। इसी बस्ती की पृष्ठभूमि पर बनी 'स्लमडाग मिलियनेयर' को आस्कर पुरस्कारों पर यहां जश्न मनाया जा रहा था। धारावी इलाके में भी लोग आस्कर पुरस्कार समारोह को देखने के लिए टीवी सेटों के सामने बैठे रहे। यहां के रहवासी अजहर शेख ने कहा,'हम जीत का जश्न मनाएंगे। आज रात को पार्टी होगी। यहां सभी लोग जश्न मनाने के मूड में हैं।' लतिका के बचपन का किरदार निभाने वाली रूबीना के परिवार को अब उसके लास एंजिलिस से लौटने का इंतजार है। उनके पिता रफीक ने कहा,'हम सभी उसे लेने हवाई अड्डे जाएंगे।'
खुशी से झूम उठा चेन्नई
चेन्नई। ए.आर. रहमान को दो आस्कर मिलने के बाद सोमवार को उनके गृहनगर चेन्नई में लोग जश्न मनाने सड़कों पर उतर आए और एक दूसरे को मिठाई खिलाते तथा बधाइयां देते दिखे। जैसे ही टीवी चैनलों पर रहमान को पुरस्कार मिलने की खबर आई, उनके प्रशंसकों ने केक काटे, मिठाइयां बांटी और पटाखे चलाए। कोदमबक्कम इलाके में उनके घर के सामने की सड़क पर उनके परिजनों ने एक विशाल केक काटा और '10000 की लड़ियों' वाला पटाखा जलाया। शहर के विभिन्न कालेजों में भी मिठाइयां बंटी। रहमान की बहन ए.आर. रेहाना के घर पर भी इसी तरह का माहौल देखा गया। रेहाना ने कहा,'हम उनके नाम के ऐलान का इंतजार कर रहे थे। मैं उस समय अल्लाह से दुआ कर रही थी। मैं हमेशा से चाहती थी कि वह पुरस्कार मिलने के बाद तमिल में बोलें और उन्होंने ऐसा ही किया। मैं बहुत खुश हूं।' उन्होंने बताया कि रहमान के लौटने के बाद उनके मैनेजरों, टीम और प्रशंसकों से मशविरा करके जश्न मनाया जाएगा।
पूकुट्टी ने देश को समर्पित किया आस्कर

लास एंजिलिस। फिल्म 'स्लमडाग मिलियनेयर' में साउंड मिक्सिंग के लिए आस्कर जीतने वाले रेसुल पूकुट्टी ने अपना पुरस्कार देश को समर्पित किया।
सोमवार को अवार्ड लेते हुए उन्होंने कहा, 'मैं इस पुरस्कार को अपने देश को समर्पित करता हूं। यह महज पुरस्कार भर नहीं है। यह इतिहास का वह हिस्सा है जो आस्कर के रूप में मुझे मिला है।'
केरल में जन्मे साउंड इंजीनियर को यह पुरस्कार इयान टैप और रिचर्ड प्राइक के साथ संयुक्त रूप से मिला। देश के अरबों प्रशंसकों को संबोधित करने हुए उन्होंने कहा, 'मैं उस देश का हूं जिसने दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाया।' लैंप के नीचे बैठकर पढ़ता था रेसुल लास एंजिलिस। 'स्लमडाग मिलेनियर' के लिए आस्कर जीतने वाले साउंड इंजीनियर रेसुल पूकुट्टी आज भले ही कामयाबी का नया मुकाम हासिल कर लिया हो, लेकिन एक दौर वह भी था जब केरल में जन्मा यह शख्स कैरोसीन लैंप के नीचे बैठकर पढ़ा करता था। पूकुट्टी ने इस फिल्म में ध्वनि मिश्रण के लिए बाफ्टा और सिनेमा आडियो सोसायटी का पुरस्कार भी जीता है।
रेसुल पूकुट्टी
जन्म : 1972, अंचल, केरल
शिक्षा : 1995 में पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट आफ इंडिया से ग्रेजुएट
करिअर का बड़ा ब्रेक : फिल्म ब्लैक [2005]
अन्य फिल्में : मुसाफिर, जिंदा, ट्रैफिक सिग्नल, गांधी माई फादर, सांवरिया, दस कहानियां, गजनी आदि।
आस्कर में जय हो का उद्घोष
लास एंजिलिस। वर्षो से देखे जा रहे ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए रहमान तुझे सलाम! सपनीली दुनिया की सैर कराने वाला हमारा बालीवुड पिछले कई सालों से आस्कर की आस लगाए बैठा था पर साल दर साल उम्मीद का यह फासला लंबा हो रहा था। अमूमन भारतीय फिल्में कोडक थियेटर की देहरी से लौट आती थीं पर 23 फरवरी को ऐसा नहीं हुआ। सुरों के सरताज एआर रहमान की धुनें 81वें अकादमी पुरस्कार देने वालों के दिलो-दिमाग में गूंज रहीं थीं। नतीजा, इस भारतीय संगीतकार ने एक नहीं, दो आस्कर पुरस्कार जीतकर इतिहास रच डाला। 'जय हो गीत' के लिए इसके रचियता गुलजार को रहमान के साथ संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का पुरस्कार हासिल हुआ है।
भारतीयों के लिए सात माह बाद इतनी सुहानी सुबह हुई थी। इससे पहले 11 अगस्त, 2008 को भी देशवासियों का सीना तब गर्व से चौड़ा हो गया था जब निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने बीजिंग ओलंपिक में भारत के लिए पहला स्वर्ण जीता था।
रहमान को यह पुरस्कार मुंबई की झोपड़पंट्टी में रहने वालों की जिंदगी पर आधारित ब्रिटिश फिल्म स्लमडाग मिलियनेयर में बेहतरीन संगीत देने के लिए हासिल हुआ है। रहमान ने सर्वश्रेष्ठ मौलिक संगीत [ओरिजिनल स्कोर] और 'जय हो' गीत के लिए गुलजार के साथ संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का पुरस्कार जीता। इसी फिल्म के लिए भारत के ही रेसुल पूकुंट्टी को सर्वश्रेष्ठ ध्वनि मिश्रण का आस्कर भी मिला। भारतीय फिल्म जगत के इतिहास में यह पहला मौका है जब एक साथ उसके कई कलाकारों ने आस्कर अवार्ड समारोह में विजेता ट्राफी हासिल की।
इससे पहले वर्ष 1983 में फिल्म 'गांधी' के लिए भानु अथैया को कास्ट्यूम डिजाइन और सिनेमा में आजीवन योगदान के लिए सत्यजीत रे को ंिवशेष आस्कर पुरस्कार से नवाजा गया था।
सशक्त पटकथा और बेहतरीन निर्देशन की बदौलत 4 गोल्डन ग्लोब और 7 बाफ्टा पुरस्कार पाने वाली 'स्लमडाग.' की आस्कर में भी दावेदारी कमजोर नहीं थी। डैनी बायल निर्देशित इस फिल्म को यहां दस श्रेणियों में नामांकन हासिल हुए थे। इनमें से स्लमडाग को 8 आस्कर पुरस्कार हासिल हुए हैं।
ग्लोबल पुरस्कार समारोहों में बीते कुछ समय से 'स्लमडाग' जिस कदर छा जाती थी, उससे इतना तय लग रहा था कि इसको कोई न कोई आस्कर जरूर मिलेगा। यही वजह थी कि सोमवार को तमाम भारतीय सुबह जल्दी उठे और टीवी चैनलों से चिपक गए। 9 बजते- बजते कोडक थियेटर में 'जय हो' की स्वर लहरियां तैरने लगी थीं। मतलब साफ था पहले कुंट्टी और बाद में रहमान ने आस्कर पर फतह पा ली थी।
'स्लमडाग' के अलावा भी समारोह में भारतीय उपस्थिति दर्ज कराई 'स्माइल पिंकी' ने। होंठ कटा होने के कारण सामाजिक बहिष्कार की शिकार उत्तार प्रदेश के मीरजापुर की नन्हीं सी लड़की पिंकी की कहानी पर आधारित इस फिल्म के लिए मेगान माइलान ने सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंट्री [लघु] का आस्कर पुरस्कार जीता।
अपनी उपलब्धि से देश का सीना चौड़ा करने वाले रहमान ने हिंदी फिल्म दीवार के मशहूर डायलाग 'मेरे पास मां है' बोलकर इस सफलता का श्रेय अपनी माता के नाम किया। मेरी मां भी यहां है और यह उनका ही आशीर्वाद है कि मुझे यह पुरस्कार मिला। मैं उन्हें यहां आने के लिए धन्यवाद देना चाहता हूं। रहमान ने कहा कि इतना रोमांचित और भयभीत तो मैं अपनी शादी के समय ही था। फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार पाने वाले बायल ने अपने आस्कर को मुंबई के लोगों के नाम समर्पित किया।
पूरे समारोह समारोह में भारत और भारतीयता का रंग कुछ ऐसा छाया, मानो हमने आस्कर फतह कर लिया हो। समारोह के दौरान रहमान द्वारा पेश किए गए स्लमडाग के गीत 'जय हो' व 'ओ साया' पर झूमते दुनिया के तमाम फिल्मकार इस बात को काफी हद तक सही भी साबित कर रहे थे।
स्लमडाग मिलियनेयर
कनाडा में भारतीय राजनयिक विकास स्वरूप की पुस्तक 'क्यू एंड ए' पर आधारित यह फिल्म मुंबई झोपड़पंट्टी में रहने वाले एक गरीब बच्चे की कहानी है, जो टीवी गेम शो जीतकर करोड़पति बन जाता है।
स्माइल पिंकी
यह फिल्म उत्तार प्रदेश के मीरजापुर जिले के रामपुर ढिबरी गांव में रहने वाली पिंकी नामक एक ऐसी छोटी लड़की पर आधारित है जिसका होंठ बचपन से ही कटा है। इसके कारण पिंकी हंस नहीं पाती है और उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। वाराणसी के डाक्टर सुबोध सिंह की मदद से पिंकी को आपरेशन के जरिए इस समस्या से निजात मिलती है और बाद में उसकी जिंदगी बदल जाती है। आस्कर की दौड़ में 'स्माइल पिंकी' ने भारतीय पृष्ठभूमि पर ही बनी एक अन्य डाक्यूमेंट्री फिल्म 'फाइनल इंच' को पछाड़ा। यह फिल्म उत्तार प्रदेश के गांवों में पोलियो के खिलाफ मुहिम की कहानी कहती है।
आस्कर पुरस्कार जीतने वालों की सूची इस प्रकार है:-
सर्वश्रेष्ठ फिल्म : स्लमडाग मिलेनियर
सर्वश्रेष्ठ निर्देशक : डैनी बोयल [स्लमडाग मिलेनियर]
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता : सीन पेन [मिल्क]
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री : केट विंसलेट [द रीडर]
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता : हीथ लेजर [मरणोपरांत 'द डार्क नाइट' के लिए]
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री : पेनोलेप क्रूज [विकी क्रिस्टीना बार्सीलोना]
सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म : डिपार्चर्स [जापान]
सर्वश्रेष्ठ रूपांतरित पटकथा : साइमन ब्यूफोय [स्लमडाग मिलेनियर]
सर्वश्रेष्ठ मौलिक पटकथा : डस्टिन लांस ब्लैक [मिल्क]
सर्वश्रेष्ठ एनीमेटेड फीचर फिल्म : वाल ई
सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन : द क्यूरियस केस आफ बेंजामिन बटन।
सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी : एंथनी डेड मेनले [स्लमडाग मिलेनियर]
सर्वश्रेष्ठ ध्वनि मिश्रण : रेसुल पूकुट्टी, इयान टैप और रिचर्ड प्राइके [स्लमडाग मिलेनियर]
सर्वश्रेष्ठ ध्वनि संपादन : द डार्क नाइट
सर्वश्रेष्ठ मौलिक स्कोर : एआर रहमान [स्लमडाग मिलेनियर]
सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत : जय हो [स्लमडाग मिलेनियर, संगीत ए आर रहमान और गीतकार गुलजार]
सर्वश्रेष्ठ कास्ट्यूम : माइकल ओ कोनोर [द डचेस]
सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंटरी फीचर : मैन आन वायर
सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंटरी [लघु]: स्माइल पिंकी
सर्वश्रेष्ठ फिल्म संपादन : स्लमडाग मिलेनियर
सर्वश्रेष्ठ मेकअप : द क्यूरियस केस आफ बेंजामिन बटन
सर्वश्रेष्ठ एनीमेटेड शार्ट फिल्म : ला मेसन एन पेटिट्स क्यूब्स
सर्वश्रेष्ठ लाइव एक्शन शार्ट फिल्म : स्लाइलजागलैंड [टायलैंड]
सर्वश्रेष्ठ दृश्य प्रभाव : द क्यूरियस केस आफ बेंजामिन बटन।
Sunday, 22 February 2009
'It's in his kiss, that's where it is' – and now scientists know why
Study reveals the chemical effect unleashed when lips collide
The ancient Greeks believed that it unleashed the soul upon a lover, whereas the Romans did it to test the sobriety of their wives. Now scientists have found that kissing alters the love chemicals of the body. Whatever the reasons why generations of lovers have engaged in the act of open-mouthed snogging, it seems that the mutual caressing of lips and the exchange of saliva changes the levels of the bonding hormone oxytocin released into the bloodstream from the brain. Intriguingly, oxytocin – which is also released during childbirth and is believed to be involved in the bonding of mother to newborn baby – actually decreases in women during a kissing bout, while it increases in their male partners. Scientists are unsure why there is this difference between the sexes, but they speculate that it may be connected with the fact that women have naturally higher levels of oxytocin in their bloodstream than men and that kissing just brings them nearer to the male level. In addition to the changes in oxytocin levels, the scientists also found that a 15-minute bout of kissing with a loved one significantly lowers the levels of the stress hormone cortisol – which can only be good for a lover's sense of well-being. "The science of kissing, known as philematology, is an under-researched area of study," said Wendy Hill, a professor of neuroscience at Lafayette College, Pennsylvania, who carried out the kissing experiments on 15 heterosexual couples who volunteered their time and their lips. "Kissing is defined as a behaviour in which an adult male and female touch lips and engage in open mouth-to-mouth contact as a sign of greeting and affection. [It has been] proposed that kissing originated as an oral food exchange between mothers and infants, a behaviour known as pre-mastication," Professor Hill said. "Pre-mastication is still common among some non-western societies. This behaviour closely resembles the kiss that is shared between adult pairs since both involve positive oral contact, neural stimulation and saliva exchange," she told the American Association for the Advancement of Science in Chicago. Helen Fisher, an anthropologist at Rutgers University, New Jersey, said that kissing may stimulate any one of the three primary brain systems involved in mating and reproduction: the sex drive, romantic love and long-term attachment. "The sex drive motivates you to seek a range of partners, romantic love motivates you to focus your mating energy on one individual at a time, feelings of attachment motivate you to sustain a pair bond at least long enough to rear a single child through infancy together," Dr Fisher said. Kissing may have evolved as a fast-acting biological strategy to assess a potential mate quickly and to initiate a sexual partnership. "Men like sloppier kisses with more open mouths and more tongue movement. The hypothesis is they're trying to get small traces of oestrogen to see where the woman is in her menstrual cycle to indicate the state of her fertility," Dr Fisher said. "There are others who think that women use smell as they are kissing to deduce some things about the man's immune system. That's not proven yet. "There's some who suggest that by kissing a man a woman is unconsciously able to detect aspects of a particular complex of genes in the immune system, and that what they're doing is being turned on by someone with different variations in the system," she said. By kissing, "you can the smell the health of their teeth and what they have been eating and drinking and smoking, and these are all devices we use to size up an individual before we do something like have sex with them," Dr Fisher said. "This is the tip of the iceberg. We are going to find many other mechanisms we unconsciously use to size up a person's biological traits."
Saturday, 21 February 2009
गरीबों का कम्प्यूटर! 500 रूपए का डिवाइज कैसे बन रहा है मददगार

यह एक ऑडियों कम्प्यूटर सिस्टम है, जो किसी म्यूजिक प्लेयर जैसा लगता है. इस डिवाइज़ को माइक्रोसोफ्ट के पूर्व इंजीनियर क्लिफ सिमीट ने लिटरेसी ब्रिज नामक एक स्वयंसेवी संस्था के सहयोग से बनाया है. यह डिवाइज करीब 10$ के अंदर उपलब्ध होता है और इसका नाम है टाकिंग बुक डिवाइज़.
इस डिवाइज के अंदर स्पीकर लगे हुए हैं और आवाज शुरू करने, बंद करने आदि के लिए प्ले, पौज़, स्टाप आदि बटन दिए हुए है. इसमें एक यूएसबी कनेक्टर है जिससे किसी भी कम्प्यूटर से डेटा ट्रांसफर किया जा सकता है.
यह डिवाइज़ अफ्रीका के घाना जैसे देश में शिक्षा और कृषि के क्षैत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहा है. घाना में लिटरेसी ब्रिज ने एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है. इस प्रोजेक्ट के तहत घाना के सुदूर ग्रामीण क्षैत्रों में किसानो तथा अन्य लोगों को शिक्षित किया जा रहा है.
घाना के कृषि अधिकारी कृषि संबंधी जानकारियाँ इस डिवाइज़ में भर देते हैं और फिर गाँव की चौपाल पर लोगों को सुनाते हैं. इसका इंटरफेस इतना आसान है कि बच्चे, बुढे, अपंग और अंध व्यक्ति भी इसका आसानी से उपयोग कर पाते हैं. गाँवों में बिजली आसानी से उपलब्ध नहीं होती है इसलिए यह डिवाइज जिंक बैटरी, सोलर बैटरी तथा अन्य किसी भी बैटरी से चल सकता है.
भारत में:
बंगालुरू की अक्षर फाउंडेशन क्लिफ सिमीट के सहयोग से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है. कर्णाटक में बंगालुरू और हुबली में दो प्रोजेक्ट शुरू किए गए है. इस समय भारत में यह डिवाइज करीब 15 डॉलर मे मिलता है. लेकिन इस संस्था का प्रयास इसे मात्र 5 डॉलर मे उपलब्ध करवाने का है.
जब वोटसन होटल के अपमान का बदला चुकाने ताजमहल होटल बना

मुम्बई का प्रसिद्ध ताजमहल होटल मुम्बई की शान माना जाता है.
जमशेदजी टाटा द्वारा निर्मित इस होटल को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने ध्वस्त करना चाहा था, लेकिन वे कामयाब ना हो सके और जमशेदजी का सपना फिर से अपनी पुरानी रौनक में लौट रहा है.
ताजमहल होटल के निर्माण के पीछे एक रोचक कहानी छुपी हुई है. सिनेमा के जनक लुमायर भाईयों ने अपनी खोज के छ: महीनों बाद अपनी पहली फिल्म का शो मुम्बई में प्रदर्शित किया था. वैसे तो वे ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे, लेकिन बीच रास्ते में उन्होने मुम्बई में भी के शो रखने की बात सोची.
7 जुलाई 1896 को उन्होने मुम्बई की आलिशान वोटसन होटल में अपनी 6 अलग अलग फिल्मों के शो आयोजित किए. इन शो को देखने के लिए मात्र ब्रिटिश लोग आए थे, क्योंकि वोटसन होटल के बाहर एक तख्ती लगी रहती थी, जिस पर लिखा होता था- भारतीय और कुत्ते होटल में नहीं आ सकते हैं.
टाटा समूह के जमशेदजी टाटा भी लुमायर भाईयों की फिल्में देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें वोटसन होटल में प्रवेश नहीं मिला. रंगभेद की इस घृणित नीति के खिलाफ उन्होनें आवाज उठाई और दो साल बाद वोटसन होटल की आभा को धूमिल कर दे ऐसी भव्य ताजमहल होटल का निर्माण शुरू करवाया.
1903 में यह अति सुंदर होटल बनकर तैयार हो गई. कुछ समय तक इस होटल के दरवाजे पर एक तख्ती भी लटकती थी जिसपर लिखा होता था – ब्रिटिश और बिल्लियाँ अंदर नहीं आ सकती.
सामाजिक संबंध क्यों और कैसे बनते हैं? इंटरनेट से मिलता है जवाब

हम इंसानों का एक नैसर्गिक गुण होता है सामाजिक संबंध बनाना. हम आसपास के लोगों, पडोसियों आदि के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बना लेते हैं. लेकिन इसके पीछे की वजह और गणित क्या है?
अमेरिका की नोर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के कुछ संशोधकों जैसे कि नोशिर कोंट्राक्टर, जेन एस. और विलीयम व्हाइट ने इसका जवाब ढुंढने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया. उन्होनें सोश्यल नेटवर्किंग संजाल सेकंड लाइफ के माध्यम से यह समझना चाहा कि लोग लोग अन्य लोगों को किस प्रकार से मित्र बनाते हैं. क्या वे अपने मित्रों के मित्रों को ही पसंद करते हैं? वे अपने समूह में शामिल हुए नए लोगों के साथ कितनी तेजी से मित्रतापूर्ण संबंध बनाते हैं? आदि.
लेकिन सेकंड लाइफ का अध्ययन ही क्यों? इसका जवाब यह है कि सेकंड लाइफ अन्य सोश्यल नेटवर्किंग साइटों से अलग है. यह एक वर्चुअल लाइफ सिमुलेशन हैं जहाँ लोग आपस मे ठीक उसी प्रकार से मिलते हैं जैसे कि वास्तविक जिंदगी में मिलते हैं. दूसरी वजह है इस साइट का बडा डेटाबेस – इस साइट के 15 मिलीयन प्रयोक्ता हैं. और तीसरी वजह यह कि इस नेटवर्क पर किशोरों और वयस्कों के लिए अलग अलग दुनिया बनाई गई है, इससे इन दोनों आयुवर्गों के लोगों के व्यवहार की जाँच करने मे आसानी रहती है.
अपनी शोध के नतीजे बताते हुए इन संशोधकों ने कहा कि किशोर अनजान लोगों की बजाए अपने मित्रो और उनके मित्रों को ही अपना मित्र बनाते हैं तथा उनसे बातचीत करते हैं. इससे यह आम धारणा गलत साबित होती है कि बच्चे इंटरनेट पर अनजान लोगों से अधिक मेलजोल स्थापित करते है.
इस शोध के अनुसार मनुष्य सुरक्षा पाने के लिए तथा अपने फायदे को देखते हुए मित्रतापूर्ण सबंध स्थापित करता है. लेकिन मित्र बनाते समय वह अपने मित्रों पर अधिक विश्वास स्थापित कर पाता है और अपने मित्र के मित्रों को अपना मित्र बनाने में उसे अधिक आसानी महसूस होती है.
कुछ नए और अनोखे मोबाइल फोन

मोबाइल या प्रोजेक्टर?
स्पेन की राजधानी बार्सिलोना मे चल रहे मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस में मोबाइल विक्रेताओं ने कुछ नए और अनोखे मोबाइल फोन प्रदर्शित किए. इनमें से कुछ मोबाइलों का ब्यौरा:
एच टी सी मैजिक:
गूगल के एंड्रोइड ओपरेटिंग सिस्टम से चलने वाला यह मोबाइल फोन टेबलेट के आकार का है और इसमें 3.2 इंच स्क्रीन लगी है. यह बहुत कुछ एपल के आईफोन जैसा लगता है. लेकिन इसमें 3 मेगापिक्सल कैमरा भी लगा है.
इसमें वाई फाई और जीपीएस भी है. यह फोन ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी मे लॉंच किया जा रहा है. लेकिन फिलहाल भारत मे उपलब्ध नही होगा.
मोबाइल या प्रोजेक्टर?
सेमसंग ने अमेरिका की टेक्सास इंस्ट्रुमेंट्स के साथ मिलकर एक ऐसा मोबाइल फोन बनाया है जो प्रोजेक्टर का काम भी दे सकता है. ‘i7410’ नामक इस फोन के साथ डीएलपी पिको चिपसेट लगाई हुई है, जो 50 इंच की स्क्रीन पर प्रोजेक्शन कर सकती है.
इसमें 5 मेगापिक्सल कैमरा भी लगा हुआ है. यह फोन पावरपोइंट प्रजेंटेशन चला सकता है, और फ्लेशलाइट का काम भी दे सकता है.
पारदर्शी मोबाइल :
एलजी ने अपना GD900 ‘Crystal’ फोन प्रदर्शित किया. इस फोन की खूबी यह है कि यह पारदर्शी है. यह एक स्लाइडिंग फोन है. स्लाइड करने पर जो कीबोर्ड दिखता है वह पूरी तरह से पारदर्शी है. यह काफी स्लीक मोबाइल है और इसके बटन जगमगाते हैं.
इसमें ब्लूटूथ सुविधा है. यह फोन इसी वर्ष जारी किया जाएगा.
Source tarakash.com
Saturday, 7 February 2009
नया सिक्स सेंस डिवाइज़, बनाएगा जिंदगी आसान

अब आपको खबरें पढने के लिए अखबार की अथवा ऑनलाइन खबरें पढने के लिए आपके कम्प्यूटर स्क्रीन की आवश्यकता नही पडेगी, क्योंकि खबरें आप कही भी पढ पाएंगे. ऐसा सम्भव हुआ है एमआईटी मीडिया लेब के प्रणव मिस्त्री और पेट्टी मेस के बनाए नए गैजेट की वजह से जिसका नाम है Wear Ur World (WUW). Wear Ur World (WUW) को गले में पहना जा सकता है और यह स्वतः इंटरनेट कनेक्शन स्थापित कर आपके काम की खबरें खोज कर दिखा सकता है. इसको किसी निश्चित स्क्रीन की जरूरत भी नही पडती है. मतलब यह कि कोई भी समतल जगह इसके लिए स्क्रीन बन सकती है. यहाँ तक की आप अपनी हथेली को भी स्क्रीन बना सकते हैं. इस डिवाइज़ की मदद से जब भी आप कोई खबर पढेंगे तो यह डिवाइज उससे संबंधित अन्य खबरें और वीडियो आदि अपने आप ढूंढ कर आपको दिखा देता है. इसके अलावा इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी लगा है. जब भी आप अपने अंगूठे और तर्जनी अंगूली की मदद से एक गोलाकार बनाते हैं तो यह डिवाइज अपने आप उसके अंदर घडी को प्रोजेक्ट कर देता है. इसके अलावा दोनों हाथों से फ्रेम जैसा आकार बनाने पर यह डिवाइज़ तस्वीरें प्रदर्शित कर सकता है. इस डिवाइज को पहनकर आप किसी स्टोर में खरीददारी करने जाइए और यह डिवाइज रैकों मे रखे सभी उत्पादों की पहचान कर उससे सम्बंधित सभी आँकडे आपको अपने आप बता सकता है. इसके आगे किसी हवाई जहाज के टिकट को लाइए और यह आपको उस जहाज की वर्तमान स्थिति के बारे में और उडान के समय के बारे में सूचित कर देता है. अभी यह डिवाइज बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है लेकिन जल्द ही यह बाजार में उपलब्ध हो जाएगा, और इसकी कीमत होगी 15000 रूपए के आसपास.
( Source tarakash.com )
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चन्द्रयान का शतक: आलोचकों का मूँह बंद
भारत के मानवरहित चन्द्रयान 1 को छोडे 100 दिन हो चुके हैं, और यह यान अपनी उम्मीदों पर खरा उतरा है. 
चन्द्रयान द्वारा चन्द्रमा की 1 लाख से अधिक तस्वीरें ली जा चुकी हैं, और अभी इस यान का कार्यकाल समाप्त नहीं हुआ है. अभी यह यान दो साल तक कार्यरत रहेगा और तब तक चन्द्रमा की इतनी तस्वीरें भेज देगा कि वैज्ञानिक चन्द्रमा का विस्तृत नक्शा बना पाएँगे. चन्द्रयान ने चन्द्रमा के कभी ना देखे गए हिस्सों की भी तस्वीरें भी भेजी है. कई वैज्ञानिकों ने चन्द्रयान के साथ मून इम्पेक्ट प्रोब को भेजने पर आपत्ति दर्ज की थी क्योंकि इसका वजन 28 किलो है, जबकि अन्य 10 उपकरणों का कुल वजन 50 किलो है. इन वैज्ञानिकों की राय थी कि मून इम्पेक्ट प्रोब को भेजने की बजाए कई और उपकरण लगाए जा सकते थे. लेकिन मून इम्पेक्ट प्रोब ने अपना काम कर दिखाया. चन्द्रमा की धरती पर गिरने से पहले इसने चन्द्रमा की शानदार तस्वीरें ली. ये तस्वीरें पहले कभी देखी गई नहीं थी, क्योंकि ये चन्द्रमा की सतह से मात्र 6 किलोमीटर उपर से ली गई थी. इसके अलावा चन्द्रमा की सतह पर गिरकर इस यंत्र ने भारतीय ध्वज को भी चन्द्रमा तक पहुँचा दिया था. गौरतलब है मून इम्पेक्ट प्रोब को भेजने का सुझाव पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का था.
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