
1919. यह वह वर्ष था जब भारत के लोग आज़ादी को पाने के लिए नई हिम्मत और एकता का उदाहरण पेश कर रहे थे. अंग्रेजों ने रोलेट एक्ट लागू किया था, जिसने आग में घी का काम किया और आज़ादी की ज्वाला को और भड़का दिया.
पंजाब में हिन्दू, सिख और मुस्लिम समुदाय की एकता अंग्रेजों को देखे नहीं सुहा रही थी. अंग्रेज किसी भी कीमत पर इस एकता को तोडने और भारतीय लोगों के मन में से निकल चुके डर को फिर से स्थापित करना चाहते थे. और इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते थे.
रोलेट एक्ट के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में एक जनसभा रखी गई थी. अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए 10 अप्रैल 1919 को दो बड़े नेताओं डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को तथा महात्मा गांधी को भी गिरफ्तार कर लिया था.
लेकिन अपने नेताओं की गिरफ्तारी से आम जनता का क्रोध और भी भड़क उठा. 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का दिन था और उस दिन हजारों की संख्या में जनसैलाब जलियांवाला बाग एकत्र हुआ था. लोगों मे बूढ़े, बच्चे, जवान और महिलाएं शामिल थी.
एक बगीचे तक जाने के लिए एक छोटा सा गलियारा था. वहीं से लोग आ-जा सकते थे. अंग्रेज ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर ने इस रास्ते को बंद कर दिया और अपनी पल्टन को निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया.
यह दुनिया के कुछ सबसे बड़े नरसंहारों में से एक था. लोगों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था. इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए.
लेकिन इस हत्याकांड ने देश को एक नई चेतना दी, नई क्रांति का सूरज उदय हुआ और लोगों ने ठान लिया की अब आज़ादी ही अंतिम लक्ष्य है. शहीद ऊधम सिंह ने लंदन जाकर माइकल ओडवायर को मार डाला. जनरल डायर बीमारी से मर गया.
13 अप्रैल 1961 को जलियाँवाला बाग स्मारक का उद्घाटन हुआ.
Source : Tarakash.com


